Uttarakhand: देहरादून के परेड ग्राउंड में उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड (उपनल) कर्मचारियों का धरना लगातार जारी है। लेकिन इस मामले में अब बेरोजगार संघ की एंट्री से नया मोड़ आ गया है। बेरोजगार संघ अध्यक्ष राम कंडवाल ने उपनल कर्मचारियों की मांगों को गैर-जरूरी, बेबुनियाद और युवा हितों के खिलाफ बताया है। उन्होंने कहा कि जिस उपनल का उद्देश्य भूतपूर्व सैनिकों का कल्याण करना था वह आज नेताओं के चहेतों को रोजगार उपलब्ध कराने का माध्यम बन गया है।
वहीं, बेरोजगार संघ के इन आरोपों का उपनल कर्मचारी महासंघ अध्यक्ष विनोद गोदियाल ने जवाब देते हुए कहा कि कोर्ट और हाईकोर्ट पहले ही नियमितीकरण पर स्पष्ट दिशा-निर्देश दे चुके हैं। अगर बेरोजगार संघ को लगता है कि नियमितीकरण गैरकानूनी है, तो वह सीधे न्यायालय जाए और वहां अपनी दलील साबित करे।
22 हजार से ज्यादा उपनल कर्मचारी अपने हक को लेकर धरने पर
तीन बार हो चुकी बातचीत की कोशिश, लेकिन तीनों बार विफल लगभग 22 हजार से ज्यादा उपनल कर्मचारी अपने हक को लेकर धरने पर बैठे हैं। इनकी मांग है कि राज्य सरकार उन्हें नियमित करे और समान काम के लिए समान वेतन की नीति लागू करे। दो हफ्तों से चल रहे इस आंदोलन में तीन बार बातचीत की कोशिश हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है।
बेरोजगार युवाओं के भविष्य पर कुठाराघात
बेरोजगार संघ के अध्यक्ष राम कंडवाल ने कहा कि उपनल संस्था का मूल मकसद पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों को रोजगार देना था, लेकिन समय के साथ इसकी व्यवस्था पूरी तरह बिगड़ गई है। कंडवाल के मुताबिक, कई प्रभावशाली नेता, अधिकारी और रसूखदार लोग अपने रिश्तेदारों को बैकडोर से उपनल के जरिए नौकरी दिला रहे हैं। ऐसे में नियमितीकरण न सिर्फ गलत है, बल्कि लाखों प्रतियोगी छात्रों और बेरोजगार युवाओं के भविष्य पर सीधा कुठाराघात है।
हम खुद हाईकोर्ट में याचिका दायर करेंगे
उन्होंने दावा किया कि सरकार ने हाईकोर्ट में नियमितीकरण के मुद्दे पर अपना पक्ष मजबूती से नहीं रखा, जिसकी वजह से मामला उलझा हुआ है। राम कंडवाल ने कहा कि अगर सरकार ढीला रवैया अपनाती रही तो बेरोजगार संघ खुद हाईकोर्ट में याचिका दायर करेगा और उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण पर रोक लगाने की मांग करेगा।
युवाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन
राम कंडवाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने उमा देवी बनाम कर्नाटक राज्य (10 अप्रैल 2006) के ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकारी विभागों में अनियमित, अस्थायी या बैकडोर नियुक्तियों को नियमित करना न तो संविधानसम्मत है और न ही यह प्रक्रिया जारी रखी जानी चाहिए। कोर्ट ने बार-बार यह भी दोहराया कि सरकारी नियुक्तियां नियमित, पारदर्शी, प्रतियोगी परीक्षाओं और मेरिट आधारित प्रक्रिया से ही होंगी। आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से असीमित प्रकार की नियुक्तियां कराई जा रही हैं। इससे न केवल लाखों योग्य बेरोजगार युवाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा है, बल्कि पारदर्शी भर्ती प्रणाली पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
उपनल कर्मी संघ ने दिया जवाब
बेरोजगार संघ के इन आरोपों का उपनल कर्मचारी महासंघ ने बेहद तीखे अंदाज में जवाब दिया है। महासंघ के अध्यक्ष विनोद गोदियाल ने बेरोजगार संघ को भ्रम फैलाने वाला संगठन करार देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पहले ही नियमितीकरण पर स्पष्ट दिशा-निर्देश दे चुके हैं।
नियमितीकरण गैरकानूनी है, तो न्यायालय जाए
उन्होंने आगे कहा, अगर बेरोजगार संघ को लगता है कि नियमितीकरण गैरकानूनी है, तो वह सीधे न्यायालय जाए और वहां अपनी दलील साबित करें। 22 हजार उपनल कर्मचारियों को बैकडोर भर्ती बताना उनके सम्मान का सीधा अपमान है। उन्होंने कहा कि बेरोजगार संघ को अपना काम करना चाहिए, न कि इस प्रदेश को Gen-Z की शुरुआत करने पर मजबूर करना चाहिए।
कौन होते हैं उपनल कर्मचारी
उपनल (उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड) उत्तराखंड सरकार का एक सार्वजनिक उपक्रम है, जिसकी स्थापना 1 मार्च 2004 को एनडी तिवारी की सरकार में की गई थी, इसकी शुरुआत पूर्व सैनिकों और अर्द्ध सैनिकों के पुनर्वास के लिए की गई थी। शुरू में इसका नाम “उत्तरांचल पूर्व सैनिक कल्याण लिमिटेड” था, जिसे बाद में 31 जनवरी 2007 को निगम का रूप देकर ‘उपनल’ नाम दिया गया।
इस निगम का मुख्य उद्देश्य पूर्व सैनिकों, अर्द्ध सैनिकों और उनके आश्रितों को रोजगार देना है। इसके लिए उपनल सरकार के विभिन्न विभागों में आउटसोर्सिंग के जरिए कर्मचारी उपलब्ध कराता है।
