Champawat: दूध की हर बूंद के पीछे पहाड़ का पसीना, फिर भी अपनी मांगों के लिए दर-दर भटक रहे पशुपालक

Champawat: पहाड़ में पशुपालन केवल किसी एक व्यक्ति का रोजगार नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़, स्वरोजगार का आधार और पलायन रोकने का एक महत्वपूर्ण जरिया है। खासकर उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में, जहां दुग्ध उत्पादन को ग्रामीण आजीविका से जोड़कर आत्मनिर्भरता की बात लगातार होती रही है, वहीं पशुपालकों को अपनी जायज मांगों के लिए शासन-प्रशासन की चौखट पर भटकना पड़ रहा है। पिछले करीब 20 दिनों से पशुपालकों की मांगों को लेकर उठ रही आवाज अब सरकार और विभागीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

चंपावत के पशुपालक राजेश बिष्ट का कहना है कि पहाड़ में पशुपालन करना आसान काम नहीं है। एक पशुपालक तड़के तीन बजे उठकर पशुओं की देखभाल शुरू करता है और रात करीब 11 बजे तक मेहनत करता है। कई बार पूरी रात चैन से सोना भी नसीब नहीं होता। इसी मेहनत का परिणाम है कि शहर और मैदान में रहने वाले लोगों की सुबह की चाय से लेकर घर की रोजमर्रा की जरूरतों तक दूध पहुंचता है। बावजूद इसके, पशुपालक की मेहनत और उसकी आर्थिक परेशानियां व्यवस्था की प्राथमिकता में दिखाई नहीं देतीं

 

उन्होंने कहा कि पशुपालकों की मांग कोई असंभव मांग नहीं है। मांग इतनी भर है कि पशुपालक का सम्मान कायम रहे, उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो और पशुपालन को ऐसा आधार मिले जिससे पहाड़ से हो रहे पलायन पर भी अंकुश लगाया जा सके। उनका आरोप है कि करीब 15-20 दिनों से आंदोलन के माध्यम से पशुपालकों की पीड़ा सरकार तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन अब तक उनकी आवाज मुख्यमंत्री और पशुपालन मंत्री तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच सकी है।

 

राजेश बिष्ट का कहना है कि सरकार और पशुपालकों के बीच संवाद का माध्यम बनाने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों और संबंधित तंत्र को दी गई है, यदि वही समस्याओं को ऊपर तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं तो यह गंभीर चिंता का विषय है। उनका सवाल है कि आखिर पशुपालकों की समस्याओं को शासन तक पहुंचाने में बाधा कहां है और उनकी आवाज को दबाने या टालने की जरूरत क्यों पड़ रही है।

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उन्होंने कहा कि पशुपालकों ने अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए मीडिया को भी माध्यम बनाया। स्थानीय पोर्टल और डिजिटल मीडिया ने उनकी समस्याओं को प्रमुखता से उठाया, लेकिन उनका कहना है कि बड़े प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों तक यह मुद्दा अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच सका। उन्होंने मीडिया से भी सवाल किया कि जब पहाड़ के हजारों परिवारों की आजीविका से जुड़ा मुद्दा करीब तीन सप्ताह से लगातार उठ रहा है, तो इसे व्यापक मंच क्यों नहीं मिल रहा।

मंत्री से संपर्क हुआ, अधिकारी से बात नहीं हो सकी

बिष्ट के अनुसार, उन्होंने पशुपालकों की समस्याओं को पशुपालन मंत्री के समक्ष भी रखा था। इसके बाद मंत्री की ओर से फोन पर संपर्क कर संबंधित अधिकारी से बात करने के लिए कहा गया और अधिकारी का नंबर भी उपलब्ध कराया गया। उनका कहना है कि उन्होंने संबंधित अधिकारी से तीन-चार बार संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन बातचीत नहीं हो सकी।

 

उनका कहना है कि जिला प्रशासन अपने स्तर पर प्रयास कर रहा है, लेकिन यदि जिले से उठी पशुपालकों की आवाज शासन के स्तर तक प्रभावी तरीके से नहीं पहुंचती है तो समस्या का समाधान कैसे होगा, यह बड़ा सवाल है।

मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन तेज करने की चेतावनी

राजेश बिष्ट ने स्पष्ट किया कि पशुपालक अपनी न्यायोचित मांगों को लेकर पीछे हटने वाले नहीं हैं। उन्होंने कहा कि जब तक समस्याओं का समाधान नहीं होता और मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया जाता, आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते छोटी दिखाई दे रही समस्या का समाधान नहीं किया गया तो आने वाले समय में यह बड़ा आंदोलन बन सकता है, जो सरकार और प्रशासन के लिए भी चुनौती खड़ी करेगा।

 

दरअसल, पहाड़ की अर्थव्यवस्था में पशुपालन की भूमिका को केवल दूध के उत्पादन तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। यह छोटे और सीमांत किसानों की आय, महिलाओं की आजीविका, स्थानीय रोजगार और गांवों में आर्थिक गतिविधियों से सीधे जुड़ा है। ऐसे में पशुपालकों की मांगों को लंबित रखना केवल एक विभागीय विषय नहीं, बल्कि पलायन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भर पहाड़ के दावे से जुड़ा सवाल भी है।

 

पशुपालकों की आवाज अब एक व्यक्ति की आवाज नहीं रह गई है। सवाल यह है कि जिस पशुपालक के श्रम से पहाड़ के गांवों की अर्थव्यवस्था चलती है, उसकी आवाज शासन की चौखट तक कब पहुंचेगी—और पहुंचेगी तो उस पर फैसला कब होगा?