Champawat: क्या आपने कभी सोचा है… एक पशुपालक किसान के जीवन का संघर्ष क्या होता है?
सुबह होने से पहले उठना…पशुओं के लिए चारा जुटाना, भूसा और पशु आहार खरीदना, दवा-इलाज कराना, दिन-रात उनकी देखभाल करना और फिर पूरी मेहनत से निकला शुद्ध, बिना मिलावट का दूध लेकर नजदीकी आंचल दुग्ध समिति तक पहुंचना।
लेकिन सवाल है—उस मेहनत की कीमत किसान को कितनी मिलती है?
पशुपालक जिस दूध को तमाम संघर्षों के बाद डेयरी तक पहुंचाता है, वही दूध प्रसंस्करण और पैकेजिंग की पूरी व्यवस्था से गुजरकर उपभोक्ता के घर कहीं अधिक कीमत पर पहुंचता है। इसी दूध से क्रीम, दही, मक्खन सहित कई दुग्ध उत्पाद भी तैयार होते हैं।
हमारा सवाल साफ है—जिस पशुपालक के बिना यह पूरी दुग्ध व्यवस्था चल ही नहीं सकती, उस पशुपालक की मेहनत का उचित दाम आखिर क्यों नहीं?
पशु आहार महंगा हुआ।
भूसा और चारा महंगा हुआ।
दवाइयां और इलाज महंगा हुआ।
परिवहन और मजदूरी महंगी हुई।
तो फिर पशुपालक के दूध का दाम उसकी बढ़ती लागत और मेहनत के अनुरूप क्यों नहीं बढ़ना चाहिए?
उत्तराखंड के पशुपालक की मांग बिल्कुल स्पष्ट है—पशुपालक किसानों को उनके दूध का उचित और सम्मानजनक न्यूनतम समर्थन खरीद मूल्य हिमाचल प्रदेश की तर्ज पे गाय के दूध पे -61/- प्रति लीटर और भैस के दूध पे 71/- प्रति लीटर मिले। दुग्ध मूल्य प्रोत्साहन राशि बढ़े रू 4/- प्रति लीटर से बढ़ाकर रू 6/- प्रति लीटर और दूध के खरीद मूल्य से लेकर बाजार में बिक्री मूल्य तक की पूरी व्यवस्था पारदर्शी हो।
अब पशुपालक का अगला संघर्ष पशुपालक किसानों के हक और उनकी मेहनत की कीमत के लिए होगा।और इस संघर्ष की शुरुआत होगी मुख्यमंत्री की विधानसभा वाले जनपद चंपावत से।
चंपावत के पशुपालक किसानों की आवाज से उठने वाला सवाल पूरे उत्तराखंड से होगा—
“हम दूध पैदा करते हैं, व्यवस्था चलाते हैं—तो हमारी मेहनत का पूरा दाम कब मिलेगा?”
हम पहले संवाद करेंगे, जवाब मांगेंगे और समाधान का अवसर देंगे।
लेकिन पशुपालक किसान की मेहनत की अनदेखी हुई तो उसकी आवाज सड़क से लेकर सरकार तक मजबूती से पहुंचाई जाएगी।
दूध हमारा—मेहनत हमारी,
तो उचित दाम भी हमारा अधिकार।
इस बार संघर्ष पशुपालक किसान के सम्मान का है।
इस बार आवाज चंपावत से उठेगी—और पूरे उत्तराखंड तक जाएगी।
