रिपोर्ट :- रोहित शर्मा
Chamoli: उत्तराखंड की स्थानीय भाषाओं और लोकसंस्कृति को अपनी लेखनी के माध्यम से जीवंत रखने वाली 19 वर्षीय *लक्ष्मी चौहान* ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। *गोपेश्वर पीजी कॉलेज* में B.A द्वितीय वर्ष की छात्रा लक्ष्मी की गढ़वाली कविता *‘जु बोल्दु छौं’* को उत्तराखंड की *प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका बुरांश* में स्थान मिला है। इससे पूर्व भी उनकी पलायन पर आधारित कविता *‘जै मेरु बस चल्दो’* इस पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है।

मूल रूप से *ग्राम सन-तितराना, पट्टी नैलचमी, भिलंगना क्षेत्र, जनपद टिहरी गढ़वाल* की निवासी लक्ष्मी चौहान पिता *प्रवीण सिंह चौहान और माता कृष्णा देवी* की बेटी हैं। साधारण परिवार से आने वाली लक्ष्मी पढ़ाई के साथ-साथ स्थानीय भाषा में साहित्य सृजन कर रही हैं। उनकी रचनाओं में पहाड़ की सामाजिक वास्तविकताएं, जनजीवन और मानवीय संवेदनाएं सहज रूप से दिखाई देती हैं।
उनकी कविता *‘जु बोल्दु छौं’* में एक स्त्री की जीवन यात्रा, उसके संस्कार, प्रेम, त्याग, ममता और जिम्मेदारियों को गढ़वाली भाषा में अभिव्यक्त किया गया है। लक्ष्मी चौहान ने बताया कि यह कविता नारी की उस महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करती है, जिसके माध्यम से वह परिवार और समाज को संवारती है। साथ ही यह संदेश भी देती है कि स्त्री को केवल उसके कर्तव्यों और त्याग से नहीं, बल्कि उसकी इच्छाओं, भावनाओं और अधिकारों के दृष्टिकोण से भी समझा जाना चाहिए। दूसरों का संसार बसाने वाली नारी भी सम्मान, प्रेम और खुशियां पाने की समान अधिकारी है।

लक्ष्मी की रचनात्मकता की विशेषता यह है कि वह अपने आसपास की वास्तविकताओं और समाज के अनुभवों को स्थानीय भाषा में शब्द देती हैं। उनकी पिछली कविता ‘जै मेरु बस चल्दो’ में पलायन जैसे गंभीर पहाड़ी मुद्दे को अभिव्यक्त किया गया था, जबकि नई रचना नारी जीवन और उसके सामाजिक योगदान पर केंद्रित है। बुरांश पत्रिका में उनकी रचनाओं को लगातार स्थान मिलना उनकी साहित्यिक यात्रा के लिए उत्साहजनक उपलब्धि है।

साहित्य और शिक्षा के साथ लक्ष्मी सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ी हैं। वह वर्तमान में *गोपेश्वर स्थित* *रूद्रेश कोचिंग* में अपनी सेवाएं दे रही हैं, जहां अनाथ बच्चों को निःशुल्क प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कराई जाती है। इस पहल में उनका योगदान शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और सामाजिक संवेदनशीलता को भी दर्शाता है।

लक्ष्मी चौहान की यह उपलब्धि केवल एक युवा कवयित्री की सफलता नहीं, बल्कि गढ़वाली भाषा, पहाड़ी संस्कृति और स्थानीय साहित्य की समृद्ध परंपरा के लिए भी उत्साहवर्धक है। उम्मीद है कि उनकी लेखनी आने वाले समय में पहाड़ की अनकही कहानियों, सामाजिक सरोकारों और लोकजीवन को इसी तरह शब्द देती रहेगी।
