रिपोर्ट सुरजीत सिंह बिष्ट
Uttarakhand : देहरादून में गुरुवार को प्रदेश के पर्यटन सचिव महोदय की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक संपन्न हुई ज़िसमें क्षेत्र के 40 क्षेत्रवासियों ने प्रतिभाग किया। इस बैठक में यात्रा के मार्ग और व्यवस्थाओं पर भी चर्चा हुई माँ नंदा भगवती के मूल स्थान ‘ *नंदाधाम सिद्धपीठ कुरुड़* ‘ की उपेक्षा तथा पारंपरिक रीति रिवाज में हस्तक्षेप व छेड़छाड़ के मुद्दे को क्षेत्र की जनता ने प्रमुखता से उठाया।

नंदाधाम सिद्धपीठ कुरुड़ की उपेक्षा पर सवाल ❓
बैठक के दौरान कुरुड़ नन्दाधाम के प्रतिनिधियों ने अपनी बात दृढ़ता से रखी कि कुछ विशेष रसूखदार व्यक्तियों द्वारा माँ नंदा भगवती के मूल स्थान **सिद्धपीठ कुरुड़* की निरंतर उपेक्षा की जा रही है। उपस्थित *गौड़ पुजारियों ने स्पष्ट किया* कि बिना कुरुड़ धाम की सहभागिता और सम्मान के बिना, बड़ी नंदाजात यात्रा की ऐतिहासिक परंपरा अधूरी है। और उसके मूल स्वरूप को किसी व्यक्ति विशेष द्वारा परिवर्तन की कोशिशों का हम सब घोर विरोध करते हैं

माँ नंदा भगवती के प्रति जनमानस के गहरी आस्था रखने वाले बधाण, दशोली तथा बंड क्षेत्रों के प्रतिनिधि,सिद्धपीठ धाम कुरुड़ के गौड़ पुजारी, माँ नंदा भगवती की सभी डोलियों के अध्यक्ष तथा थोकदार ( *चौदह संयाणा* ) के प्रतिनिधि ने अपनी बात रखी।
पद्मश्री बसंती बिष्ट ने भी दी विस्तार से जानकारी
इस बैठक में *पद्मश्री से सम्मानित, उत्तराखंड की प्रसिद्ध जागर गायिका बसंती देवी बिष्ट* भी उपस्थित रही। उन्होंने माँ नंदा के इस हिमालयी महाकुंभ की आध्यात्मिक व सांस्कृतिक पक्ष की जानकारी दी।
सिद्ध पीठ नंद धाम कुरुड़ का महत्व
उन्होंने बताया कि बड़ी नंदाजात के निम्मित नन्दाधाम कुरुड़ ही माँ नंदा का मूल स्थान और इस यात्रा का केंद्र व प्रारम्भ बिंदु है।

12 वर्षों में होने वाली इस कठिन यात्रा के *सभी पड़ावों और उनके पौराणिक महत्व* की विस्तृत जानकारी दी।उन्होंने पारंपरिक जागरों और गीतों के माध्यम से यात्रा की पूर्ण रूपरेखा पर्यटन सचिव के सम्मुख रखी और पर्यटन सचिव को अपनी *नंदा के जागर* नामक पुस्तक भी भेंट की ।
पर्यटन सचिव ने अवगत कराया है कि मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित समिति के समक्ष यह प्रस्ताव रखा जाएगा और अगली बैठक में आपको शासन के निर्णय से अवगत कराया जाएगा ।
