पहाड़ी रीति-रिवाज: चैत महीने का कल्यों

रिपोर्ट – प्रीतम सिंह नेगी 

उत्तराखंड में पुरानी परंपरा से ही पहाड़ों में एक रीति रिवाज चलते आया है। वह है…चैत के महीने का कल्यों (ओवो)।दरअसल, ध्याणीयां चैत का महीना शुरू होते ही अपने मैतियों की आश, उम्मीद और इंतजार में अपने मैतियों का इंतजार करती थी। जब ध्याणीयों के मैति कल्यों लेकर आते थे तो अपनों से मिलने की खुशी वो अकल्पनीय रहती थी, साथ ही ध्याणीयों को चैत के महीने का कल्यों (ओवो) दिया जाता है, लेकिन आज वो कल्यों में मजा नहीं रह गया।

जहां पहले कल्यों लेकर आते थे तो अपनों से प्यार, प्रेम सुख-दुख और रिश्तेदारी बढती थी। आज का चैत के महीने का कल्यों आधुनिकता के समय में Google pay /Phone Pay ने समाप्त कर दिया है।

ये भी पढ़ें 👉:उत्तराखंड में 17 स्थानों के नाम बदले, धामी सरकार का बड़ा फैसला

आज कल एक बात आम सी हो गई है वह ये कि मैं पैसे भेज रहा हूं तुम लोग चैत के महीने का कल्यों बांट देना / ले जाना । पुराने समय में चैत के महीने का कल्यों अरसा,रोटिना दिया करते थे और आज आधुनिकता की दौड़ में लड्डू से ही काम चला रहे हैं। आधुनिकता की दौड़ ने धीरे-धीरे हमारे रिश्तों को खत्म कर दिया है । यहीं स्थिति रहेगी तो वो दिन भी दूर नहीं है जब कल्यों के बारे में किसी को पता ही नहीं चलेगा और चैत के महीने का कल्यों केवल यादों में रह जायेगा।

जब हम छोटे हुआ करतें थे तो दादी, मां, चाची,ताई के मैत से आये चैत के कल्यों को बांटने के लिए अपने भाई बहनों यार दोस्तों से चैत के महीने का कल्यों बांटने के लिए बहुत सी लड़ाई झगडे होते थे। जब तक कल्यों बांटा नहीं जाता था तो तब तक जहां कल्यों रखा रहता था वहां से हिलते तक नहीं थे और सबसे ज्यादा आनंद तब आता था जब पूरा गांव घूम कर कल्यों बांटकर वापसी आते थे, आखिरी में जो थोड़ा सा कल्यों बच जाता था उसे खाने में जो आनंद आता था वह जीवन के मुझे नहीं लगता कि किसी अन्य भोजन में आता होगा।

आज कई वर्षों बाद भी मैंने कल्यों बांटा और वो बचपन की यादें ताजा कर दी है। आप सभी भी आधुनिकता के इस दौर को किनारे करके चैत के महीने का कल्यों अपनी ध्याणियों के वहां जाकर दें। इस पहाड़ी रीति रिवाज को जिंदा रखे और अपनी संस्कृति को आगे बढाने का कार्य करें ।

 

—-

छात्र संघ अध्यक्ष, महाविद्यालय कर्ण प्रयाग