Buransh: युवा कवियत्री लक्ष्मी चौहान ने गढ़वाली कविता से बढ़ाया पहाड़ का मान, ‘बुरांश’ पत्रिका में प्रकाशित हुई रचना,‘जै मेरो बस चल्दो ’ कविता को मिला साहित्यिक मंच,।

गोपेश्वर: पहाड़ की मिट्टी में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। जरूरत है तो उन्हें पहचानने, प्रोत्साहित करने और उचित मंच देने की। उत्तराखंड की युवा प्रतिभा लक्ष्मी चौहान ने महज 19 वर्ष की उम्र में अपनी गढ़वाली कविता के माध्यम से इसी बात को साबित किया है।
मूल रूप से नेलचामी पट्टी, भिलंगना, जनपद टिहरी गढ़वाल की रहने वाली लक्ष्मी चौहान वर्तमान में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोपेश्वर में बी.ए. द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं। पढ़ाई के साथ-साथ लक्ष्मी को गढ़वाली भाषा और साहित्य से विशेष लगाव है और वह लगातार गढ़वाली भाषा में कविताओं का लेखन कर रही हैं।
लक्ष्मी चौहान की इसी साहित्यिक प्रतिभा को अब एक महत्वपूर्ण मंच मिला है। उनकी गढ़वाली कविता “जै मेरो बस चल्दो” का प्रकाशन उत्तराखंड की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘बुरांश’ में हुआ है। महज 19 वर्ष की उम्र में किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में अपनी रचना का प्रकाशित होना लक्ष्मी के साथ-साथ उनके परिवार, शिक्षण संस्थान और पूरे क्षेत्र के लिए गौरव की बात है।
गढ़वाली भाषा और पहाड़ की संवेदनाओं को दे रहीं शब्द
लक्ष्मी चौहान अपनी कविताओं के माध्यम से गढ़वाली भाषा, पहाड़ की संस्कृति और यहां की संवेदनाओं को शब्द देने का प्रयास कर रही हैं। उनकी रचना “जै मेरो बस चल्दो” का ‘बुरांश’ पत्रिका में प्रकाशित होना इस बात का प्रमाण है कि नई पीढ़ी में भी अपनी लोकभाषा और संस्कृति के प्रति गहरा जुड़ाव मौजूद है।
लक्ष्मी के पिता प्रवीण सिंह चौहान और माता कृष्णा देवी हैं। टिहरी गढ़वाल की धरती से निकलकर गोपेश्वर में शिक्षा हासिल कर रहीं लक्ष्मी अब साहित्य के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

रूद्रेश कोचिंग गोपेश्वर से भी जुड़ी हैं
लक्ष्मी चौहान वर्तमान में रूद्रेश कोचिंग, गोपेश्वर से भी जुड़ी हुई हैं और कोचिंग संस्थान के स्टाफ सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं।
विशेष बात यह है कि रूद्रेश कोचिंग द्वारा अनाथ एवं जरूरतमंद बच्चों के लिए निःशुल्क कोचिंग की व्यवस्था की गई है। लक्ष्मी चौहान इस पहल से जुड़कर बच्चों की शिक्षा में भी अपना योगदान दे रही हैं। इस तरह एक ओर वह अपनी पढ़ाई और साहित्यिक लेखन को आगे बढ़ा रही हैं, वहीं दूसरी ओर जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा में सहयोग देकर सामाजिक जिम्मेदारी भी निभा रही हैं।
गोपेश्वर में शिक्षा और साहित्य का साथ
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोपेश्वर में बी.ए. द्वितीय वर्ष की पढ़ाई कर रही लक्ष्मी का साहित्य के प्रति यह रुझान युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक है। पहाड़ के दूरस्थ क्षेत्रों से आने वाले युवाओं के लिए शिक्षा के साथ अपनी भाषा, संस्कृति और साहित्य से जुड़े रहना आज के समय में विशेष महत्व रखता है।
लक्ष्मी की उपलब्धि यह संदेश देती है कि प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। यदि मेहनत, लगन और सही अवसर मिले तो पहाड़ का युवा किसी भी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना सकता है।

लक्ष्मी चौहान की कहानी इसी उम्मीद की एक खूबसूरत मिसाल है। टिहरी गढ़वाल के नेलचामी पट्टी से निकलकर गोपेश्वर में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहीं लक्ष्मी ने अपनी कविता “जै मेरो बस चल्दो” के माध्यम से गढ़वाली भाषा को साहित्यिक मंच पर स्थान दिलाया है।
उनकी यह उपलब्धि उनके परिवार के साथ-साथ राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोपेश्वर, रूद्रेश कोचिंग गोपेश्वर और पूरे चमोली-टिहरी क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है।
