कौन है सैम मानेकशॉ? जिन पर बनी फिल्म, उत्तराखंड से भी रहा उनका नाता 

Sam Bahadur: देश के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ पर बनी फिल्म ‘सैम बहादुर’ सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। अपने पिता के खिलाफ जाकर 1932 में मानेकशॉ ने IMA देहरादून में दाखिला लिया। 


Field Marshal Sam Manekshaw: इन दिनों देशभर में सैम मानेकशॉ के नाम की खूब चर्चा हो रही है। दरअसल, भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ पर बनी फिल्म ‘सैम बहादुर’ (Sam Bahadur) शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। मेघना गुलजार द्वारा निर्देशित पीरियड ड्रामा में विक्की ने 1971 में पाकिस्तान को धूल चटाने वाले सैन्य अधिकारी मानेकशॉ की मुख्य भूमिका निभाई है। मानेकशॉ 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर शानदार जीत के प्रमुख वास्तुकार माने जाते हैं, जिसके कारण बांग्लादेश का जन्म हुआ। सैम मानेकशॉ का उत्तराखंड से भी पुराना नाता रहा है। तो आइये जानते हैं कि आखिर कौन हैं सैम मानेकशॉ? और उनकी बहादुरी से जुड़े कुछ अनोखे किस्से…

सैम मानेकशॉ का है उत्तराखंड से पुराना नाता

बता दें कि जनरल सैम मानेकशॉ का उत्तराखंड से पुराना नाता रहा है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नैनीताल जिले के शेरवुड कॉलेज में हुई थी। इतना ही नहीं दून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी के लिए चुने जाने वाले 40 कैडेटों के पहले बैच में भी सैम मानेकशॉ शामिल थे। इसके अलावा देहरादून कैंट में मुख्यमंत्री आवास के समीप बना 58-जीटीसी जूनियर हाईस्कूल की नींव का पत्थर 11 अक्तूबर 1966 में तत्कालीन ले. ज. सैम मानेकशॉ ने रखा था।

कौन है सैम मानेकशॉ?

सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को पंजाब के अमृतसर जिले में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता होर्मसजी मानेकशॉ एक डॉक्टर थे। सैम का पूरा नाम सैम होरमूजजी फ्रांमजी जमशेदजी मानेकशॉ था। लेकिन उनके दोस्त, परिवार वाले उन्हें सैम या ‘सैम बहादुर’कह कर ही पुकारते थे। उन्होंने अपनी प्राथमिक स्कूली शिक्षा शेरवुड कॉलेज नैनीताल से की। इसके बाद हिंदू सभा कॉलेज से मेडिकल की शिक्षा हासिल की।

सैम मानेकशॉ बनना चाहते थे डॉक्टर

मानेकशॉ के पिता डॉक्टर थे और वे खुद भी डॉक्टर बनना चाहते थे। मानेकशॉ डॉक्टरी पढ़ने के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे, लेकिन उनके पिता ने उन्हें ये कहकर इजाजत नहीं दी कि विदेश में अकेले रहने के लिए उनकी उम्र बहुत कम है। इस बात से वे पिता से नाराज हो गए और एक तरह से उनके फैसले के खिलाफ विद्रोही तेवर अपनाते हुए 1932 में भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में दाखिला लिया और दाे साल बाद 4/12 फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट में भर्ती हुए। छोटी सी उम्र में ही उन्हें युद्ध में शामिल होना पड़ा था।

1939 में हुई शादी

मानेकशॉ 1937 में अपनी पत्नी सिल्लू बोडे से मिले। उन्होंने दो साल बाद 22 अप्रैल 1939 को शादी की और उनकी दो बेटियाँ है।

सैम मानेकशॉ का आर्मी करियर 

सैम मानेकशॉ ने सेना में 40 वर्षों तक अपनी सेवाएं दी। उनका एक प्रतिष्ठित सैन्य करियर था जो द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा के साथ शुरू हुआ, जो चार दशकों और पांच युद्धों तक फैला रहा। उन्होंने पांच युद्धों में साहसपूर्वक लड़ाई लड़ी थी।

द्वितीय विश्व युद्ध में लगीं सात गोलियां 

सैम को सबसे पहले शोहरत मिली साल 1942 में। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बर्मा के मोर्चे पर एक जापानी सैनिक ने अपनी मशीनगन की सात गोलियां उनकी आंतों, जिगर और गुर्दों में उतार दीं। उनकी जीवनी लिखने वाले मेजर जनरल वीके सिंह ने एक साक्षात्कार में बताया, ‘उनके कमांडर मेजर जनरल कोवान ने उसी समय अपना मिलिट्री क्रॉस उतार कर कर उनके सीने पर इसलिए लगा दिया क्योंकि मृत फौजी को मिलिट्री क्रॉस नहीं दिया जाता था।’ जब मानेकशॉ घायल हुए थे तो आदेश दिया गया था कि सभी घायलों को उसी अवस्था में छोड़ दिया जाए क्योंकि अगर उन्हें वापस लाया जाता तो पीछे हटती बटालियन की गति धीमी पड़ जाती। लेकिन उनका अर्दली सूबेदार शेर सिंह उन्हें अपने कंधे पर उठा कर पीछे लाया।

“इलाज करिए नहीं तो गोली चला दूंगा”

उस समय सैम की हालत इतनी खराब थी कि डॉक्टरों ने उन पर अपना समय बरबाद करना उचित नहीं समझा। तब सूबेदार शेर सिंह ने डॉक्टरों की तरफ अपनी भरी हुई राइफल तानते हुए कहा था, ‘हम अपने अफसर को जापानियों से लड़ते हुए अपने कंधे पर उठा कर लाए हैं। हम नहीं चाहेंगे कि वह हमारे सामने इसलिए मर जाएं क्योंकि आपने उनका इलाज नहीं किया। आप उनका इलाज करिए नहीं तो मैं आप पर गोली चला दूंगा।’ डॉक्टर ने अनमने मन से उनके शरीर में घुसी गोलियां निकालीं और उनकी आंत का क्षतिग्रस्त हिस्सा काट दिया। आश्चर्यजनक रूप से सैम बच गए। पहले उन्हें मांडले ले जाया गया, फिर रंगून और फिर वापस भारत। साल 1946 में लेफ्टिनेंट कर्नल सैम मानेकशॉ को सेना मुख्यालय दिल्ली में तैनात किया गया।

इंदिरा से बोले- ‘आप ऑपरेशन रूम में नहीं घुस सकतीं…’

1962 में चीन से युद्ध के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण ने सीमा क्षेत्रों का दौरा किया था। प्रधानमंत्री नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी भी उनके साथ थीं। सैम के एडीसी ब्रिगेडियर बहराम पंताखी अपनी किताब सैम मानेकशॉ- द मैन एंड हिज टाइम्स में लिखते हैं, ‘सैम ने इंदिरा से कहा था कि आप ऑपरेशन रूम में नहीं घुस सकतीं क्योंकि आपने गोपनीयता की शपथ नहीं ली है। इंदिरा को तब यह बात बुरी भी लगी थी लेकिन सौभाग्य से इंदिरा और मानेकशॉ के रिश्ते इसकी वजह से खराब नहीं हुए थे।’

 1971 युद्ध से पहले सैम के जवाब से हैरान हो गई थीं इंदिरा

इतिहास के पन्नों में दर्ज देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सैम मानेकशॉ का यह किस्सा काफी चर्चित है। दरअसल, 1971 की लड़ाई में इंदिरा गांधी चाहती थीं कि वह मार्च में ही पाकिस्तान पर चढ़ाई कर दें। हालांकि, सैम ने ऐसा करने से इनकार कर दिया क्योंकि भारतीय सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी। इंदिरा गांधी इससे नाराज भी हुईं। मानेकशॉ ने पूछा, ‘आप युद्ध जीतना चाहती हैं या नहीं’। जवाब हां में मिला। इस पर मानेकशॉ ने कहा, ‘मुझे छह महीने का समय दीजिए। मैं गारंटी देता हूं कि जीत आपकी होगी’।इंदिरा गांधी ने सेना के प्रशिक्षण के लिए कुछ समय दिया और 1971 में सैम के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना के साथ युद्ध किया और केवल 14 दिनों में पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।

इंदिरा गांधी के साथ के कई किस्से हैं मशहूर

इंदिरा गांधी के साथ उनकी बेतकल्लुफी के कई किस्से मशहूर हैं। मेजर जनरल वीके सिंह कहते हैं, “एक बार इंदिरा गांधी जब विदेश यात्रा से लौटीं तो मानेकशॉ उन्हें रिसीव करने पालम हवाई अड्डे गए। इंदिरा गांधी को देखते ही उन्होंने कहा कि आपका हेयर स्टाइल जबरदस्त लग रहा है। इस पर इंदिरा गांधी मुस्कराईं और बोलीं, और किसी ने तो इसे नोटिस ही नहीं किया।

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 इदी अमीन के साथ किया था भोज

एक बार युगांडा के सेनाध्यक्ष इदी अमीन भारत के दौरे पर आए। उस समय तक वह वहां के राष्ट्रपति नहीं बने थे। उनकी यात्रा के आखिरी दिन अशोक होटल में सैम मानेकशॉ ने उनके सम्मान में भोज दिया, जहां उन्होंने कहा कि उन्हें भारतीय सेना की वर्दी बहुत पसंद आई है और वो अपने साथ अपने नाप की 12 वर्दियां युगांडा ले जाना चाहते हैं। सैम के आदेश पर रातोंरात कनॉट प्लेस की मशहूर दर्ज़ी की दुकान एडीज खुलवाई गई और करीब बारह दर्जियों ने रात भर जाग कर इदी अमीन के लिए वर्दियां सिलीं।

 फील्ड मार्शल की उपाधि पाने वाले पहले भारतीय जनरल 

सैन मानेकशॉ को अपने सैन्य करियर के दौरान कई सम्मान प्राप्त हुए। 59 की उम्र में उन्हें फील्ड मार्शल की उपाधि से नवाजा गया। यह सम्मान पाने वाले वह पहले भारतीय जनरल थे। 1972 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। एक साल बाद 1973 में वह सेना प्रमुख के पद से सेवा-निवृत्त हो गए। सेवा-निवृत्ति लेने के बाद वह वेलिंगटन चले गए। वेलिंगटन में ही वर्ष 2008 में उनका निधन हो गया।

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