West Bengal: ममता बनर्जी के इस्तीफा न देने पर क्या होगा असर? संविधानविदों ने बताया पूरा सच

West Bengal की राजनीति में इस समय एक बड़ा संवैधानिक सवाल चर्चा में है—अगर चुनाव हारने के बाद भी मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से इनकार कर दें तो क्या होगा? मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के हालिया बयान के बाद यह मुद्दा और गर्मा गया है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को भारी जीत मिली है, जबकि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद ममता बनर्जी ने स्पष्ट किया है कि वह लोकभवन जाकर इस्तीफा नहीं देंगी। ऐसे में इस पर संवैधानिक बहस तेज हो गई है।

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संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि मुख्यमंत्री का इस्तीफा देना या न देना इस स्थिति में ज्यादा मायने नहीं रखता। चुनाव के बाद जब विधानसभा का पांच साल का कार्यकाल पूरा हो जाता है, तो वह स्वतः समाप्त मानी जाती है और नई विधानसभा के गठन के साथ नई सरकार का रास्ता साफ हो जाता है।

राज्यसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल योगेन्द्र नारायण के अनुसार, चुनाव परिणाम के बाद जिस दल को बहुमत मिलता है, वह राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश करता है और राज्यपाल उसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं। इसके बाद नई सरकार का गठन हो जाता है।

वहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसआर सिंह ने Article 172(1) of the Indian Constitution का हवाला देते हुए कहा कि विधानसभा का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है और इसके समाप्त होते ही वह भंग मानी जाती है। ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद का अस्तित्व भी स्वतः समाप्त हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील सुशील जैन का कहना है कि यदि मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं भी देते हैं, तो राज्यपाल के पास उन्हें बर्खास्त करने का संवैधानिक अधिकार होता है और नई सरकार को शपथ दिलाई जा सकती है।

यह पूरा घटनाक्रम भारतीय राजनीति में एक नए ट्रेंड की ओर भी इशारा करता है, जहां नेता पद छोड़ने से इनकार करते नजर आते हैं। इससे पहले दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal ने भी जेल जाने के बावजूद इस्तीफा नहीं दिया था।

कुल मिलाकर संविधानविदों की राय स्पष्ट है कि इस स्थिति में ममता बनर्जी का इस्तीफा देना या न देना व्यावहारिक रूप से ज्यादा मायने नहीं रखता, क्योंकि नई विधानसभा और नई सरकार का गठन तय प्रक्रिया के तहत हो ही जाएगा।